
देहरादून | देवभूमि उत्तराखंड में नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को लेकर राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। सत्ताधारी भाजपा ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण से जुड़े प्रावधान का विरोध कर महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में आयोजित प्रेस वार्ता में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले दस वर्षों में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि संसद में पेश विधेयक का उद्देश्य आधी आबादी को नीति-निर्माण में समान भागीदारी देना था, लेकिन कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी और डीएमके ने इसका विरोध किया।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि “इतिहास साक्षी है, मातृशक्ति कभी हारती नहीं है। हम देश की नारी को विश्वास दिलाते हैं कि उनका अधिकार उन्हें अवश्य मिलेगा।”
भाजपा का प्रदेशव्यापी विरोध
भाजपा ने इस मुद्दे पर विपक्ष के खिलाफ प्रदेशभर में विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है। पार्टी की महिला मोर्चा सड़क पर उतरकर विपक्षी दलों के खिलाफ प्रदर्शन करेगी। भाजपा का कहना है कि विपक्ष ने सकारात्मक भूमिका निभाने के बजाय राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी।
कांग्रेस का पलटवार
वहीं कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि महिला आरक्षण विधेयक वर्ष 2023 में पहले ही पारित हो चुका है। कांग्रेस का दावा है कि वर्तमान विवाद परिसीमन से जुड़ा है और सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक रूप दे रही है। कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश जैसे गरिमामयी मंच का उपयोग विपक्ष पर हमले के लिए किया गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
परिसीमन बना विवाद की जड़
जानकारों के मुताबिक, विवाद की असली वजह परिसीमन प्रक्रिया है। देश में अब तक चार बार परिसीमन हो चुका है—पहला 1952 में और अंतिम 2002 में, जो 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ था। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए 2001 तक परिसीमन पर रोक लगा दी गई थी, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर असर न पड़े।
अब प्रस्तावित परिसीमन को लेकर सियासी खींचतान तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, धामी सरकार इस मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है, जिसमें निंदा प्रस्ताव लाया जा सकता है।



