कूड़ा बीनने वालों और उनके बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों नहीं? हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्रदेश में कूड़ा बीनने वाले परिवारों और उनके बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। कोर्ट ने शहरी विकास विभाग के निदेशक सचिव से पूछा है कि प्रदेश में कूड़ा बीनने वाले किस समुदाय से आते हैं और उन्हें जीवनयापन के लिए जरूरी सुविधाएं क्यों उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। साथ ही उनके बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए सरकार की ओर से क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी जानकारी भी मांगी है।
शुक्रवार को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने शहरी विकास विभाग के निदेशक सचिव को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले में अगली सुनवाई के लिए तीन सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है।
विधिक सेवा प्राधिकरण की रिपोर्ट पर कोर्ट ने लिया संज्ञान
दरअसल, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों की सर्वे रिपोर्ट में पता चला कि कूड़ा बीनने वाले परिवारों को जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। उनके बच्चों को भी राज्य और केंद्र सरकार की ओर से संचालित योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कूड़ा बीनने के काम में लगे होने के कारण बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास पर असर पड़ रहा है।
इस मामले में कोर्ट के समक्ष यह बात रखी गई कि कूड़ा बीनने वाले परिवार भी समाज का अहम हिस्सा हैं और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में उन्हें और उनके बच्चों को आम नागरिकों की तरह सरकारी सुविधाओं और योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए, ताकि इन परिवारों के बच्चों को मजबूरी में कूड़ा बीनने का काम न करना पड़े।
अब हाईकोर्ट ने सरकार से इस दिशा में उठाए गए कदमों और उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं का ब्योरा मांगा है।



