बाहर से विनिर्माण के लिए लाई कृषि उपज पर विकास सेस नहीं लगेगा, हाईकोर्ट ने निर्माता इकाइयों को दी राहत

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कृषि उपज विपणन अधिनियम, 2011 की धारा 27(c)(v) के पहले परंतुक को विधायी क्षमता से परे बताते हुए निर्माता इकाइयों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य के बाहर से केवल विनिर्माण या प्रसंस्करण के लिए लाई गई कृषि उपज पर, यदि उसका कोई क्रय-विक्रय नहीं हुआ है, तो विकास उपकर (Development Cess) नहीं लगाया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने आशीर्वाद एग्रो इंडस्ट्रीज बनाम राज्य उत्तराखंड समेत 42 याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद 16 सितंबर 2026 को फैसला सुरक्षित रखा गया था।
याचिकाकर्ताओं की आटा, सूजी, मैदा, चावल, कॉर्न स्टार्च, ग्लूटेन, कागज और प्लाईवुड आदि बनाने वाली इकाइयां हैं। ये इकाइयां धान, गेहूं, मक्का, दलहन और लकड़ी जैसी कृषि उपज राज्य के बाहर से मंगाती हैं। मंडी समितियों की ओर से इन इकाइयों को “अन्य द्वितीयक आगमन” (Other Secondary Arrival) मानते हुए विकास उपकर के नोटिस जारी किए गए थे।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के गुजरात अंबुजा एक्सपोर्ट्स बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में वर्ष 2016 में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस मामले में कृषि उपज विपणन अधिनियम की धारा 27(c)(iii) को विधायी क्षमता के अभाव में रद्द किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि उपकर का नाम बदलने, मंडी शुल्क हटाकर केवल उपकर रखने या किसी आगमन को “प्राथमिक” अथवा “द्वितीयक” बताने से संवैधानिक दोष दूर नहीं होता।
खंडपीठ ने कहा कि किसी शुल्क की वैधता तय करने के लिए उसका वास्तविक स्वरूप और वह घटना महत्वपूर्ण है, जिस पर शुल्क लगाया जा रहा है। केवल यह तथ्य कि उपकर की राशि सड़क, पुल या अन्य बाजार संबंधी ढांचे पर खर्च की जाती है, राज्य को कर लगाने की शक्ति प्रदान नहीं करता।
अदालत ने राज्य सरकार की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 27(c)(v) को रद्द नहीं किया था, इसलिए वह वैध मानी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी प्रावधान पर न्यायालय द्वारा निर्णय न दिया जाना उसकी वैधता की पुष्टि नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने मां उमा एग्री फूड मामले में दिए गए उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें केवल कृषि उपज को राज्य के बाहर से लाने को एक अलग “पृथक्करणीय लेनदेन” माना गया था। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस तर्क को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
इसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ताओं को जारी किए गए वे नोटिस और मांगें रद्द कर दी गईं, जिनमें केवल विनिर्माण या प्रसंस्करण के लिए राज्य के बाहर से लाई गई कृषि उपज पर विकास उपकर की मांग की गई थी।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि बाजार क्षेत्र में कृषि उपज की वास्तविक खरीद या बिक्री होती है अथवा किसी अन्य वैध प्रभार संबंधी प्रावधान की शर्तें पूरी होती हैं, तो मंडी शुल्क या उपकर लगाने पर इस फैसले का असर नहीं होगा। सभी याचिकाओं का निस्तारण कर दिया गया और खर्च के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।



