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न्याय प्रणाली पर चिंता जताना आलोचना नहीं, बल्कि संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में एक कदम है: न्यायमूर्ति मनमोहन

नई दिल्ली। सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स और सोसाइटी ऑफ लीगल प्रोफेशनल्स ने आज लीगल कॉन्क्लेव एंड अवॉर्ड्स सेरेमनी 2026 का आयोजन किया, जिसमें देशभर के प्रतिष्ठित न्यायविद, वरिष्ठ अधिवक्ता, विधि विशेषज्ञ, शिक्षाविद और बार प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनमोहन और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने क्रमशः मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में उद्घाटन सत्र की शोभा बढ़ाई। यह सत्र सबके लिए न्याय – सुलभ और किफायती विषय पर आधारित था।
सभा को संबोधित करते हुएन्यायमूर्ति मनमोहन ने कहा न्याय प्रणाली को लेकर चिंताएं उठाना आलोचना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे सुधार के माध्यम से उसे मजबूत करने के प्रयास के रूप में समझा जाना चाहिए। लंबित मामलों से लेकर तकनीक के प्रभाव तक कई मुद्दों पर विभिन्न न्यायिक क्षेत्रों में चर्चा हो रही है। हमें इन पर अधिक खुलापन, शिक्षाविदों के साथ बेहतर संवाद और अपने संस्थानों को निरंतर सुधारने की इच्छा के साथ काम करना होगा।
उन्होंने आगे कहा तकनीक एक महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा मानव द्वारा ही लिया जाना चाहिए। मध्यस्थता (मेडिएशन) विवादों को कम करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक बनकर उभरी है, क्योंकि विशेषकर पारिवारिक मामलों में एक समझौता कई जुड़े हुए मामलों को एक साथ सुलझा सकता है। वहीं, यदि पंचाट (आर्बिट्रेशन) महंगा हो गया है और अदालत की प्रक्रिया जैसा दिखने लगा है, तो इसके दोषों को सुधार के माध्यम से दूर करना आवश्यक है, ताकि वैकल्पिक विवाद समाधान अपनी मूल भावना के अनुरूप बना रहे।
इस अवसर पर बोलते हुए चेतन शर्मा ने कहा छह करोड़ से अधिक लंबित मामलों के साथ, भारत को न्याय वितरण के तरीके में संरचनात्मक बदलाव की आवश्यकता है। मध्यस्थता और अन्य सहमति-आधारित विवाद समाधान प्रक्रियाएं इस बदलाव के केंद्र में होनी चाहिए, विशेषकर पारिवारिक विवादों में, जहां उद्देश्य लंबी कानूनी लड़ाई के बजाय समाधान और मेल-मिलाप होना चाहिए। अदालतों को ऐसे स्थान बनना चाहिए जो समाधान और सामंजस्य को बढ़ावा दें। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा, दस्तावेज़ीकरण और प्रारंभिक हस्तक्षेप के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया मानव-आधारित ही रहनी चाहिए। एक शांतिपूर्ण और कम मुकदमेबाजी वाला समाज उत्पादकता, सामाजिक सौहार्द और 2047 के भारत के बड़े लक्ष्य के लिए आवश्यक है।
अपने संबोधन में कॉन्क्लेव के अध्यक्ष और एसआईएलएफ के अध्यक्ष डॉ. ललित भसीन ने कहा, “यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि न्याय के द्वार हमारे देश के हर नागरिक के लिए खुले रहें। लगभग छह करोड़ लंबित मामलों के मद्देनज़र, न्याय को अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए त्वरित और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है, साथ ही पुराने, ओवरलैपिंग और कमजोर रूप से तैयार किए गए कानूनों का सरलीकरण भी जरूरी है। पंचाट, जिसे कभी मुकदमेबाजी का एक विश्वसनीय विकल्प माना जाता था, मजबूत संस्थागत ढांचे के अभाव और बढ़ती लागत के कारण अपनी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया है। इसलिए मध्यस्थता और अन्य सहमति-आधारित समाधान प्रक्रियाओं पर अधिक जोर देना आवश्यक है, ताकि न्याय सुलभ, किफायती और जन-केंद्रित बन सके।
उद्घाटन सत्र में सोसाइटी ऑफ लीगल प्रोफेशनल्स के सचिव योगिंदर सिंह चौधरी और अध्यक्ष रवि शर्मा ने भी अपने विचार रखे। इस अवसर पर न्यायमूर्ति मनमोहन, चेतन शर्मा और डॉ. ललित भसीन ने ‘इकोनॉमिक जस्टिस एंड पब्लिक फाइनेंस फॉर सोशल चेंज: एन एप्रेज़ल इन द लाइट ऑफ डॉ. आंबेडकर’स विज़न’ नामक पुस्तक का विमोचन किया। प्रो. (डॉ.) विजय कुमार सिंह द्वारा संपादित यह पुस्तक संवैधानिक मूल्यों, आर्थिक संरचनाओं और सार्वजनिक नीति के अंतर्संबंधों की समीक्षा करती है तथा सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को आगे बढ़ाने में सार्वजनिक वित्त की भूमिका को रेखांकित करती है। उद्घाटन सत्र का एक प्रमुख आकर्षण “रिकग्नाइजिंग नारी शक्ति – वीमेन पावर” रहा, जिसमें भारत की प्रमुख विधि फर्मों का नेतृत्व कर रहीं अग्रणी महिलाओं को सम्मानित किया गया। उन्हें विधि क्षेत्र में उनके नेतृत्व और योगदान के लिए सम्मान पट्ट प्रदान किए गए। इस दौरान डॉ. ललित भसीन ने कहा कि इन प्रतिष्ठित महिलाओं ने अपनी योग्यता, क्षमता, ज्ञान और पेशे के प्रति समर्पण के बल पर भारत की अग्रणी विधि फर्मों का नेतृत्व हासिल किया है और उनके योगदान को और अधिक मान्यता मिलनी चाहिए। कार्यक्रम का समापन अवॉर्ड सेरेमनी के साथ हुआ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति तेजस कारिया मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस दौरान विभिन्न विधिक श्रेणियों में उत्कृष्ट संस्थानों और व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। इनमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सिधार्थ लूथरा को “लीगल ल्यूमिनरी ऑफ द ईयर” और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली के संस्थापक एवं पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) रणबीर सिंह को “लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड” से सम्मानित किया गया। इस कॉन्क्लेव में देशभर से प्रतिष्ठित न्यायविद, वरिष्ठ अधिवक्ता, लॉ फर्म लीडर्स, शिक्षाविद, बार प्रतिनिधि और विधि पेशेवर शामिल हुए। यह न्याय को अधिक सुलभ और किफायती बनाने की आवश्यकता पर संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बना, साथ ही विधि क्षेत्र में उत्कृष्टता, नेतृत्व और योगदान को भी सम्मानित किया गया। विधिक समुदाय के विभिन्न हितधारकों को एक मंच पर लाकर इस आयोजन ने भारत की न्याय प्रणाली को सशक्त बनाने में सहयोग, सुधार और मान्यता के बढ़ते महत्व को रेखांकित किया।

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