
नैनीताल। कैंची धाम में कथित वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी का मामला अब उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका में बदला मामला
पिथौरागढ़ जिले के बासीखेत निवासी ठाकुर सिंह डसीला द्वारा भेजे गए एक पत्र पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया। पत्र में आरोप लगाया गया है कि बाबा नीब करौरी द्वारा स्थापित कैंची धाम का संचालन करने वाले ट्रस्ट की मूलभूत जानकारी भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि ट्रस्ट का नाम, पंजीकरण विवरण, कार्यालय का पता, ट्रस्टियों की संख्या और उनकी नियुक्ति संबंधी जानकारी प्रशासन या रजिस्ट्रार कार्यालय में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है।
करोड़ों के चढ़ावे का हिसाब सार्वजनिक नहीं
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि मंदिर में प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है, लेकिन आय-व्यय का सार्वजनिक विवरण जारी नहीं किया जाता। विदेशी श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए विदेशी अंशदान और नकद दान के लेखा-जोखा तथा ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई गई है।
अन्य प्रमुख मंदिरों का दिया उदाहरण
याचिका में बदरीनाथ-केदारनाथ धाम का उदाहरण देते हुए कहा गया कि उनका संचालन अधिनियम के तहत किया जाता है, जबकि जागेश्वर मंदिर का प्रबंधन जिला प्रशासन की निगरानी में समिति द्वारा किया जाता है। देश के अन्य बड़े मंदिरों में भी सरकारी निगरानी या वैधानिक व्यवस्था लागू है।
धार्मिक ट्रस्टों का पंजीकरण भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत होता है, इसलिए ट्रस्ट डीड, पंजीकरण प्रमाणपत्र, ट्रस्टियों का विवरण, संपत्ति और वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। साथ ही, ट्रस्ट प्रबंधन में स्थानीय ग्रामीणों और सम्मानित नागरिकों को शामिल करने की भी मांग की गई है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब प्रस्तुत करने को कहा है।



